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क्या पत्नी सोनिया शर्मा को हरिद्वार देहात पर लड़ा पाएंगे अगला चुनाव?

एम हसीन

हरिद्वार। खानपुर विधायक उमेश कुमार की धर्मपत्नी सोनिया शर्मा को लेकर एक बार फिर चर्चा चल निकली है कि वे 2027 का चुनाव लड़ेंगी। अहम यह है कि इस बार चर्चा उनकी हरिद्वार देहात सीट पर उम्मीदवारी की है। अभी महज छः महीने पहले तक वे लक्सर सीट पर संभावित उम्मीदवार मानी जा रही थी। उन्हें 2025 से पहले रुड़की महानगर में मेयर पद का संभावित प्रत्याशी भी माना गया था। इससे पहले 2024 के लोकसभा चुनाव में तो उन्होंने बसपा की सदस्यता भी ग्रहण कर ली थी और बसपा ने उन्हें अपना संभावित लोकसभा प्रत्याशी मानकर संसदीय क्षेत्र का पार्टी प्रभारी भी बना दिया था। इन सारी चीजों के बावजूद आज तक की हकीकत यह है कि सोनिया शर्मा की शिरकत किसी चुनाव में नहीं हुई। हर बार चुनावी समय आते-आते उन्होंने अपना कार्यक्रम बदल दिया। यह कहीं न कहीं उमेश कुमार की दिशा भ्रमिता का संकेत देता है। साफ लगता है कि या तो वे अपने इरादों को लेकर स्पष्ट नहीं हैं या फिर इरादों पर अमल करने में सक्षम नहीं हैं या फिर वे अपनी टास्क खुद तय नहीं कर रहे हैं।

उमेश कुमार की खानपुर में 2021 में एयर लैंडिंग हुई थी। दीपावली तक वे यहां प्रत्याशी नहीं थे और ऐन दीपावली वाले दिन प्रत्याशी बन गए थे। यह अपने इस बात का सबूत है कि वे यहां आए नहीं थे बल्कि या तो भेजे गए थे या बुलाए गए थे। जिस ग्रुप ने उन्हें बुलाया था उसका मकसद इतने मात्र से पूरा हो गया था कि उन्होंने यहां विधायक निर्वाचित हो कर यहां के ताजदार (अर्थात राजा) विधायक प्रणव सिंह चैंपियन का राजनीतिक करियर ब्रेक कर दिया था। वैसे चैंपियन का करियर पहले ही भाजपा ने भी ब्रेक करना तय कर लिया था, जब चैंपियन की बजाय उनकी पत्नी को टिकट दिया था। चैंपियन ने 2022 में अपना चौथा कार्यकाल पूरा किया था और अगर उन्हें टिकट मिलता तो वे पांचवीं बार भी विधायक बनते। यह रिकॉर्ड फिलहाल हरिद्वार विधायक मदन कौशिक के नाम है और फिर चैंपियन के नाम भी होता। यही रिकॉर्ड ब्रेक करना, चैंपियन को विधानसभा से बाहर करना उस का समय उद्देश्य था जो उनके जीतने मात्र से पूरा हो गया था।

अगला मसला उमेश कुमार का था। विधायक बनने के बाद उमेश कुमार से अपेक्षित था कि वे खुद को क्षेत्र की जनता से जोड़ते, अपने क्षेत्र के बड़े बूढ़ों को गंभीरता से लेते और जो महत्वकांक्षाएं उनके भीतर पल रही थी उन्हें धीरे धीरे सिर उठाने देते। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वे अपने कथित हमदर्दों का टूल बने रहे और अपने नदीदेपन से, अपनी नातजरबेकारी से अपनी महत्वकांक्षाओं पर कुर्बान होते गए। ये कुछ कम बात नहीं है कि पिछले 5 साल में वे एक लोकसभा का चुनाव भी लड़ चुके हैं, जबकि निकाय चुनाव में, जैसा कि उनसे अपेक्षित था, उन्होंने कोई भूमिका अदा नहीं की थी। की भी तो ऐसी की, कि भाजपा के उसी वर्ग को नाराज़ कर बैठे थे जिसका उन्हें 2022 में खुला सहयोग मिला था। अब इसे क्या कहा जाए कि वे एक राजनीतिक पार्टी का गठन किए बैठे हैं और तय नहीं कर पा रहे हैं कि उसे चलाएं या शिथिल रहने दें। वे कभी लक्सर विधायक से खफा होते हैं तो अपनी पत्नी को लक्सर में प्रत्याशी बनाने की बात करने लगते हैं। कभी रुड़की विधायक से खफा होते हैं तो पत्नी को रुड़की में मेयर प्रत्याशी बनाने लगते हैं। अब हरीश रावत से खफा हैं तो पत्नी को हरिद्वार देहात पर प्रत्याशी बनाने की बात सामने आ रही है। अपने ऐसे फैसलों से उमेश कुमार प्रबुद्धजन के बीच अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं। किसी को नहीं लगता कि सोनिया शर्मा को हरिद्वार देहात पर चुनाव लड़ाएंगे या लड़ा पाएंगे। अब तो बस बात इतनी सी है कि क्या वे खानपुर में उस ग्रुप का समर्थन हासिल कर पाएंगे जिसने उन्हें 2022 में विधायक बनाया था?