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निर्णायक घड़ियों में बिखर रहा कांग्रेसी राजनीति का ताना बना
एम हसीन
रुड़की। किसी को राज्य का सी एम बनने की महत्वाकांक्षा है तो किसी को सुपर सी एम। कोई दो लोगों की टकराहट के बीच अपनी रोटियां सेक रहा है तो कोई लगी हुई आग को हवा दे रहा है। इसका नतीजा यह है कि निर्णायक घड़ी के आने पर कांग्रेसी राजनीति का ताना बना बिखर रहा है और कार्यकर्ताओं में निराशा बढ़ती जा रही है। जनता को भी नहीं लगता कि भाजपा सरकार की दस साल की सत्ता के बाद अगर कहीं एंटी इनकंबैंसी के हालत बनेंगे भी तो कांग्रेस उसे कैश कर पाएगी और अपने कार्यकर्ताओं तथा अपनी समर्थक जनता को कोई राहत दे पाएगी।
कार्यकर्ताओं को याद है कि 2022 में जब माना जा रहा था कि कांग्रेस सत्ता में आ रही है तब भाजपा दो तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में लौटी थी। तब पार्टी के तमाम बड़े चेहरों में कोई बिरला ही जीतकर आ पाया था। मैदान से लेकर पहाड़ तक पार्टी के तमाम बड़े चेहरे अपना व्यक्तिगत चुनाव भी नहीं जीत पाए थे। यह अपने आप में इस बात का प्रमाण था कि इन चेहरों को इतना भाजपा प्रत्याशियों ने नहीं हराया था जितना इन्होंने खुद एक दूसरे को हराया था। इसका नतीजा पार्टी कार्यकर्ताओं और पार्टी समर्थक मतदाताओं पर भारी पड़ा था। कारण बड़े चेहरे तो किसी न किसी स्तर पर