
क्या बहुकोणीय होगा रुड़की में अगला विधानसभा चुनाव?
एम हसीन
रुड़की। नगर विधानसभा क्षेत्र में 90 हजार से कुछ अधिक वोटों पर अंतिम चुनाव 2012 में हुआ था। तब कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में प्रदीप बतरा 22 हजार से अधिक वोट लेकर करीब 6 सौ वोटों के अंतर से जीते थे। लेकिन उस चुनाव का एक अहम पक्ष यह था कि वह कांग्रेस और भाजपा के बीच हुआ सीधा संघर्ष नहीं था। तब बसपा के टिकट पर डॉ नैय्यर काजमी ने भी चुनाव लड़ा था जिन्होंने साढ़े 9 हजार के करीब वोट लिए थे और तब यहां प्रत्याशी समाजवादी पार्टी का भी चुनाव लड़ा था, जिसने भले ही दो हजार से कुछ कम वोट लिए थे लेकिन लिए थे। यही स्थिति 2013 के निकाय चुनाव में रही थी। तब भाजपा-कांग्रेस-बसपा प्रत्याशियों समेत कई प्रत्याशी चुनाव लड़े थे और जीत निर्दलीय यशपाल राणा की हुई थी। यह निकाय चुनाव उस समय 89 हजार वोटों के आधार पर हुआ था। अब एस आई आर के बाद नगर क्षेत्र में वोटों की संख्या घटकर लगभग उतनी ही रह गई है जितनी 2012 में थी। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि क्या यहां चुनावी स्थिति भी वही बन रही है जो 2012 में थी? क्या 2027 में भी यहां बहुकोणीय मुकाबले की स्थिति बन सकती है और छोटे दलों के अलावा निर्दलीय के लिए भी संभावनाएं विकसित हो सकती हैं?
जैसा कि सब जानते हैं कि रुड़की में 1952 के पहले चुनाव से ही किसी भी निर्दलीय के चुनाव जीतने का कोई रिकॉर्ड नहीं है। लेकिन एक बार, 1985 में, कांग्रेस के बागी के रूप में प्रताप नारायण बरतर के बेहद मजबूत चुनाव लड़ने का रिकॉर्ड है। तब रुड़की नगर के अलावा 126 गांवों में फैली विधानसभा सीट पर चुनाव लड़ते हुए बरतर ने लगभग समूचे नगर को अपने पक्ष में लामबंद कर लिया था और करीब 18 हजार वोट लिए थे। इसका नतीजा राजनीतिक रूप से अहम इस अर्थ में रहा था कि तब गृह राज्य मंत्री व कांग्रेस प्रत्याशी रामसिंह सैनी चुनाव हार गए थे जबकि राष्ट्रीय लोकदल के प्रत्याशी क़ाज़ी मुहिउद्दीन चुनाव जीत गए थे। यही दरअसल, छोटे दलों के प्रत्याशी या प्रभावशाली निर्दलीय प्रत्याशी करते रहे हैं। मिसाल 2003 से 2019 के बीच हुए उन चार निकाय चुनाव की दी जा सकती है जब बहुकोणीय चुनाव हुए और दलीय प्रत्याशी कभी भी नगर प्रमुख नहीं बन सका था। 2025 में आकर भाजपा ने यह स्थिति बदली थी। लेकिन भाजपा प्रत्याशी अनीता देवी अग्रवाल भी बहुकोणीय मुकाबले में ही मेयर बन पाई थी और वह भी तब, जब वोटों की संख्या करीब पौने 2 लाख थी।
अब 2027 में मतदान का अनुपातिक प्रतिशत अगर वही रहता है जो रहता आया है तो मतदान 65 से 70 हजार के बीच रह सकता है और हारने-जीतने वाले प्रत्याशी का जो आंकड़ा 2022 में करीब 35 और करीब 37 हजार था वो फिर घटकर 20-22 हजार पर आ सकता है। ऐसी स्थिति में कोई प्रभावशाली चेहरा निर्दलीय के रूप में भी जीत जाने की संभावनाएं बना सकता है और किसी छोटे दल का प्रत्याशी मजबूत चुनाव लड़कर हार-जीत के समीकरणों को बदलने की स्थिति में भी आ सकता है। यह बात राजनीतिक दल या राजनीतिक लोग न जानते हों, ऐसा नहीं है। इसी कारण संभावना इसी बात की है कि नई परिस्थितियों में नगर सीट पर बहुकोणीय मुकाबले के हालात बन जाएं।

