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दशकों से स्थापित नेताओं के लिए क्या वे बजा पाएंगे खतरे की घंटी?

एम हसीन

हरिद्वार। खानपुर विधायक उमेश कुमार की ट्रेजेडी यह है कि 5 साल विधायक रहने के बावजूद वे हरिद्वार जिले की राजनीति की मुख्य धारा का हिस्सा नहीं बन पाए हैं। यह स्थिति तब है जब अपने इसी कार्यकाल के बीच वे एक लोकसभा का चुनाव भी लड़ चुके हैं। इसके बावजूद न वे भाजपा का दरवाजा अपने लिए खोल पाए हैं, न कांग्रेस का और न ही शायद बसपा का। वे पांच साल पहले भी निर्दलीय थे और बावजूद इस सच के, कि वे अपने राजनीतिक दल का गठन कर चुके हैं, उस दल को चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व वाली आजाद समाज पार्टी के साथ मिलकर चलाने का प्रयास कर चुके हैं, वे आज भी निर्दलीय हैं। 2027 का चुनाव अगर उन्हें लड़ना है तो उनके सामने निर्दलीय लड़ना ही एकमात्र विकल्प नज़र आता है। हालांकि कुछ उनके समर्थक, कुछ हरीश रावत व क़ाज़ी निज़ामुद्दीन विरोधी कांग्रेसी, कुछ त्रिवेंद्र सिंह रावत व प्रणव सिंह चैंपियन विरोधी भाजपाई तथा कुछ हाजी शहजाद विरोधी बसपाई उन्हें उनकी जीत का यकीन दिला रहे हैं लेकिन खुद उमेश कुमार का एक्ट बता रहा है कि वे बतौर निर्दलीय या बतौर जन निर्माण पार्टी प्रत्याशी खानपुर में अपने भविष्य को सुरक्षित नहीं समझ रहे हैं। उन्हें इस बात का भरपूर अहसास सताता महसूस हो रहा है कि 5 साल तक लगातार नाटकीय, आक्रामक, और कथित रूप से जन हितैषी राजनीति करने के बावजूद उनकी जमीन खानपुर में चुनौतिहीन नहीं बन पाई है। खासतौर पर गरीब युवतियों की शादी कराने के अपने जन हितैषी काम पर उनके पक्ष में जनमत नहीं बन पा रहा है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि उनका विपक्ष पर असहयोग का आरोप लगाकर विधानसभा के अंतिम सत्र के अंतिम दिन सदन से इस्तीफा देने का ऐलान क्या उन्हें खानपुर में निर्णायक स्थिति में पहुंचा सकता है? सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि विपक्ष के संदर्भ में उनके द्वारा किए गए ऐलान का एक अर्थ यह भी है कि वे अब हरिद्वार जिले में विपक्ष का सफाया करने के लिए काम करेंगे। अब अगर यह माना जाए कि वे जिले के गैर-भाजपा विधायकों को विपक्ष मान रहे हैं तो क्या कांग्रेस और बसपा के सभी विधायकों को चुनावी दौड़ से बाहर कर देने में वे सक्षम हैं? ध्यान रहे कि जिले में कांग्रेस व बसपा के अधिकांश मौजूदा विधायक दशकों से सदन का हिस्सा रहे हैं और जो 2022 में पहली बार विधायक बने थे वे भी राजनीति लंबे समय से कर रहे हैं। उनके अपने वजूद तो हैं ही, उन्हें अपने अपने राजनीतिक दलों का संरक्षण भी है। हालात का इशारा यह कि 2022 के विधानसभा चुनाव में उमेश कुमार को इन सभी स्थापित चेहरों के या तो परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष समर्थन का लाभ मिला था या फिर समाज के बीच इनके विरोध का लाभ मिला था। उमेश कुमार के पक्ष में यह स्थिति कायम रह सकती थी, बशर्त विधायक बनने के बाद वे किसी दल का अपने लिए दरवाजा खोल लेते। लेकिन ऐसा हो नहीं सका। यह एक स्थिति है।

दूसरी स्थिति यह है कि पिछले 5 सालों में खानपुर क्षेत्र की स्थिति बदल चुकी है। हालात ये हैं कि आज रुड़की, मंगलौर, लंढौरा और लक्सर के पत्रकारों में ही उमेश कुमार का व्यापक विरोध देखने में आ रहा है। प्रणव सिंह प्रकरण में प्रतिक्रिया करते हुए उन्होंने गुर्जर बिरादरी को न केवल एकजुट कर दिया है बल्कि उसे अपने विरोध में भी खड़ा कर लिया है। यही स्थिति विधायकों की है। उन्होंने अपने निर्दलीय होने का लाभ उठाते हुए पहले दिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ अपनी निकटता को प्रकट किया था और फिर पांच साल तक जिले के हर विधायक, हर सांसद, हर मंत्री को अपने से हेच ही समझा। यही कारण है कि किसी कारण या किसी समीकरण के चलते अगर कोई दूसरा विधायक अगले चुनाव में उनकी मदद कर भी देता तो वह करना नहीं चाहता। राजनीतिज्ञों, खास तौर पर एक खास वर्ग में, प्रणव सिंह चैंपियन से नाराज़गी अभी भी कायम है लेकिन उसका कोई लाभ 2027 में उमेश कुमार को शायद अब नहीं मिल पाएगा। इन स्थितियों को उमेश कुमार खुद भी जानते हैं। इसी कारण वे पूरे हरिद्वार जनपद की राजनीतिक तस्वीर को बदलने की हुंकार भर रहे हैं। उनकी सोच शायद यह है कि वे अपनी जन निर्माण पार्टी के टिकट पर सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी लड़ाएंगे और यूं मौजूदा विधायकों के सामने मुश्किल पैदा करेंगे। जाहिर है कि अगर उनकी कोशिशों से कोई विपक्षी विधायक मुश्किल में आता भी है तो भी इसका लाभ उनकी पार्टी को तो पहुंच नहीं पाएगा। अगर विपक्ष का कोई मौजूदा विधायक हारा भी तो जीत तो निश्चित रूप से भाजपा के खाते में जाएगी। यही शायद उनका उद्देश्य भी है।