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क्या बगावत की हद तक जा सकता है पार्टी का यह वफादार?

एम हसीन

खानपुर। आधुनिक राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि किसी दल का सबसे बड़ा चेहरा बिल्कुल सामान्य कार्यकर्ता के वजूद से बहुत डरता है। कांग्रेस की राजनीति में यह परंपरा खासतौर पर नज़र आती है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि पार्टी के तथाकथित बड़े नेताओं का जनाधार पार्टी के पक्ष में सकारात्मक रूप से काम करता दिखाई नहीं देता। इसी कारण बड़े नेता अपनी ही पार्टी के सामान्य कार्यकर्ता को हराने में तो अक्सर कामयाब हो जाते हैं लेकिन उसे विजयी बनाने की उनकी न कोई इच्छा होती, न कोशिश होती है और न ही वे ऐसा करने में कामयाब हो पाते हैं। उदय पुंडीर के साथ ऐसा ही हुआ है। तीन बार से विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटे उदय पुंडीर को 2025 में जब नगर पंचायत का टिकट मिला तो वे अपने ही नेताओं की मंशा को नहीं भांप सके और खेत रहे। आज जब वे तीसरी बार विधानसभा टिकट पर दावा कर रहे हैं तो उनके नेता उनके संदर्भ में इसी चुनाव को और इसी के परिणाम को इस्तेमाल कर रहे हैं। बेशक खुद को लेकर उदय पुंडीर पार्टी में बन रहे इस माहौल को जानते होंगे। लेकिन क्षेत्र में उनकी तैयारियां फिर भी जारी हैं। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि अगर उन्हें 2027 में भी पार्टी टिकट न मिला तो वे क्या करेंगे? क्या इस बार उदय पुंडीर बगावत की हद तक जाएंगे? क्या वे निर्दलीय या किसी और दल के टिकट पर चुनाव लड़ने का हौसला दिखा पाएंगे?

जैसा कि सब जानते हैं कि उदय पुंडीर कांग्रेस में हरीश रावत खेमे की राजनीति करते हैं। हरीश रावत से ही उन्होंने खानपुर सीट पर 2017 व 2022 में टिकट मांगा था, जो कि उन्हें नहीं मिला था। कारण, तब हरीश रावत हरिद्वार देहात सीट पर पहले अपने लिए और फिर अपनी पुत्री अनुपमा रावत के टिकट का संघर्ष कर रहे थे। तब उनके पास उदय पुंडीर की सहायता करने का मौका नहीं था। इसीलिए जब कांग्रेस ने 2022 में खानपुर सीट पर सुभाष चौधरी को टिकट दिया तो रावत कुछ बोल नहीं सके। सुभाष चौधरी 2017 में लक्सर सीट पर बसपा के प्रत्याशी रह चुके थे और बिरादरी से गुर्जर थे। तब यहां भाजपा की देवयानी भी गुर्जर थी और बसपा के रविंद्र पनियाला भी गुर्जर थे। यही कारण है कि यहां गुर्जर विरोधी माहौल बन गया था, जिसका लाभ निर्दलीय उमेश कुमार को मिला था। ऐसा बेवजह नहीं हुआ था। यह पार्टी के बड़े नेताओं की कारगुजारी थी और उद्देश्य था 2027 में टिकट पर स्थानीय दावेदारी को खत्म करना। जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है कि उदय पुंडीर हरीश रावत कैंप की राजनीति करते हैं और आज हरीश रावत ही खानपुर में कांग्रेस टिकट के सबसे बड़े दावेदार हैं। और दूसरे नंबर के दावेदार हैं हरीश रावत के ही पुत्र वीरेंद्र रावत जो 2024 में हरिद्वार सीट पर कांग्रेस के प्रत्याशी थे। जाहिर है कि 2022 के विधानसभा चुनाव की और 2025 के निकाय चुनाव की राजनीति इसी जरूरत के तहत हुई थी, जिसमें नगर पंचायत अध्यक्ष पद का टिकट स्वीकार करके उदय पुंडीर फंस गए थे। फंस इसलिए गए थे क्योंकि निकाय चुनाव में उनकी मदद किसी बड़े नेता ने नहीं की थी और तमाम स्थानीय कांग्रेसी भी उनके खिलाफ ही रहे थे।

लेकिन इन सारी चीजों का जो सामूहिक परिणाम हो रहा है वह यह है कि उदय पुंडीर के नेता ही उनकी दावेदारी को किसी खातिर में नहीं ला रहे हैं। अर्थात, कम से कम पार्टी के भीतर उनके लिए 2027 में भी रास्ता खुलता दिखाई नहीं देता। एक ओर यह स्थिति है और दूसरी स्थिति यह है कि संभवतः खानपुर सीट पर यह अंतिम चुनाव होगा। परिसीमन के बाद क्या होगा यह न तो फिलहाल उदय पुंडीर जानते हैं और न ही कोई और। बहुत संभव है कि नए परिसीमन के बाद यह सीट आरक्षित हो जाए। आखिर यह भी सच है कि 2002 से 2012 तक यह क्षेत्र आरक्षित था। क्षेत्र आरक्षित होगा तो उदय पुंडीर चाह कर भी चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। संक्षेप यह कि यह उनके सामने अंतिम अवसर है। क्या इस अवसर का लाभ उठाने के लिए वे बगावत की हद तक जाएंगे? हालांकि ऐसा उनका कोई इतिहास नहीं है। फिर भी उनके हालात को देखना दिलचस्प होगा।