प्रदीप बतरा के टिकट पर लटक रही है तलवार?

एम हसीन

रुड़की। तर्क यह है कि जो पार्टी सरकार के कार्यकाल के अंतिम वर्ष में रुड़की विधायक प्रदीप बतरा को कैबिनेट में शामिल कर रही है, कैसे माना जाए कि वह 2027 में प्रदीप बतरा का विधानसभा का टिकट काटने का इरादा रखती है? तर्क मजबूत है। लेकिन यह भी सच है कि भाजपा में टिकट के दावेदारों के हौसले बुलंद हैं। एक ओर, पंजाबी होने के नाते महेंद्र काला टिकट को लेकर बेहद उत्साहित हैं दूसरी ओर चेरब जैन की गतिविधियां चुनाव पूर्व की बेला में चरम पर पहुंची हुई हैं। इन दोनों के बीच जिला महामंत्री अक्षय प्रताप सिंह अलग ही तरीके से खुद को दावेदार के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। वे मुँह से कुछ कहने की बजाय खुद को पार्टी की गतिविधियों से इतना गंभीरता और कर्मठ ता से जोड़ रहे हैं कि जिला स्तर पर हर विचार हर गतिविधि को लेकर लगभग केंद्रीय भूमिका में दिखाई दे रहे हैं। होर्डिंग्स में खुद को प्रदीप बतरा का सहोदर जाहिर कर रहे संजय अरोरा भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में कहीं न कहीं मन में यह मलाल लिए दिखाई देते हैं कि शायद “बतरा शरणम् गच्छामि” करके उन्होंने गलती कर दी! अर्थात, वे भी जताने की कोशिश कर रहे हैं कि अगर बतरा का टिकट कटता है तो वे दावेदार आज भी हो सकते हैं।

भाजपा के लिए 2027 का चुनाव जीवन-मरण का सवाल होगा। जेन-ज़ी गतिविधियों के अलावा राहुल गांधी की आक्रामकता के कारण एक वर्ग यह प्रेसेप्शन बनाने की कोशिश कर रहा है कि जनमत भाजपा के खिलाफ जा रहा है। ऐसे में 2027 का उत्तराखंड परिणाम भाजपा की 2029 की संभावनाओं पर भारी पड़ेगा। ऐसा न हो पाए, इसके लिए भाजपा सबकुछ करेगी। उसके लिए जीत का लक्ष्य होगा और कोई भी हारने वाला चेहरा पार्टी को मंजूर नहीं होगा।

प्रदीप बतरा का दंभ आज यह है कि “रुड़की इज़ बतरा; बतरा इज़ रुड़की” लेकिन भाजपा उन्हें हारा हुआ प्रत्याशी न केवल मान रही है बल्कि उस चीज को सार्वजनिक भी कर रही है। मसलन, कार्यकाल के अंतिम वर्ष में नगर की सड़कों को चमकाने के प्रदीप बतरा के अभियान पर पार्टी नेता अभिषेक चंद्रा का यह बयान भारी पड़ गया कि “पुरानी सड़कों को तोड़े बगैर ही उन्हें दोबारा बनाया जा रहा है।” असर यह हुआ है कि अब सड़कों की पहले खुदाई की जा रही है। उसके बाद उनका निर्माण होगा। अर्थात सड़कों की ऊंचाई अब नहीं बढ़ेगी। यह प्रदीप बतरा के मिजाज के खिलाफ तो है लेकिन उनके सुरक्षात्मक होने का प्रमाण भी है। अभी तक बतरा ने किसी की कोई परवाह कभी नहीं की थी। जाहिर है कि ऐसा बेवजह नहीं हो रहा है।

भाजपा इस बात को बेहतर जानती है कि अगर उसने रुड़की में इस बार टिकट बदलकर किसी और को विधायक नहीं बनाया तो भाजपाई बतरा को चुनाव हारकर किनारे कर देंगे; ठीक वैसे ही जैसे 2012 में सुरेश जैन किए गए थे। यह बात भाजपाई पार्टी के बड़े नेताओं को समझा रहे हैं कि “रुड़की नगर प्रदीप बतरा का नहीं है बल्कि भाजपा का है।” इसका आगे मतलब यह है कि भाजपाइयों के लिए जब प्रदीप बतरा डूबता हुआ जहाज़ बन गए हुए हैं। फिर जाहिर है कि भाजपा तो उनके साथ डूबने को तैयार होगी नहीं। यही कारण है कि भले ही प्रदीप बतरा रुड़की शहर का खुद को पर्याय मान रहे हों लेकिन शहर में जलवा महेंद्र काला का दिखाई दे रहा है।