
अब कांग्रेसी वोटों में सेंधमारी करना चाहते हैं करतार सिंह भड़ाना
एम हसीन
मंगलौर। इस विधानसभा सीट पर 2024 में हुए उप चुनाव को करीब ढाई साल बीत चुके हैं और इस दौरान करतार सिंह भड़ाना की जानकारी मेँ वे तथ्य भली भांति आ गए हैं जिनके चलते उनके हिस्से में महज ढाई सौ वोटों की हार आई थी। वे यह भी जानते हैं कि 2027 में जो होगा वह उप-चुनाव नहीं बल्कि सामान्य चुनाव होगा। तब उन्हें अपनी पार्टी में बैठे लोगों का समर्थन या विरोध तो मिलेगा, लेकिन सरकार में बैठे लोगों का समर्थन या विरोध नहीं मिलेगा। अर्थात, सामान्य चुनाव में सब कुछ उनकी अपनी परफॉर्मेंस पर निर्भर करेगा। वे अगर मतदाता को अपने पक्ष में गोलबंद कर पाए तो फिर विजय श्री उनकी होगी और वह उनकी अपनी विजय श्री होगी। इसी सोच के तहत उन्होंने मंगलौर विधानसभा क्षेत्र में अपनी पूरी शक्ति झोंकी हुई है। उन्हें इस चीज का भारी लाभ मिलता दिखाई दे रहा है कि वे पराजित हैं लेकिन सरकार उनकी पार्टी की है। फिर वे व्यक्तिगत रूप से भी आर्थिक तौर पर सक्षम हैं। जनता की समस्याएं छोटी-मोटी हैं और उनके हल के लिए जहां सरकारी तंत्र भड़ाना की मदद नहीं करता वहां उनका अपना तंत्र काम करता है। अहम यह है कि इस बार भड़ाना के निशाने पर कांग्रेस समर्थक मतदाता हैं जिनकी सुनवाई सरकारी तौर पर इसलिए नहीं हो पाती क्योंकि उन्होंने विपक्ष के प्रत्याशी को चुना है। इस स्थिति का भड़ाना पूरा लाभ उठा रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि वे अपने विरोधियों को यहां सांप्रदायिकता की राजनीति करने का अवसर भी नहीं दे रहे हैं। वे समग्र समाज की सुनवाई कर रहे हैं।
मंगलौर मुख्यत: ग्रामीण या अर्ध नगरीय निर्वाचन क्षेत्र है। यहां भले ही एक चीनी मिल के अलावा कई बड़े उद्योग स्थापित हुए हुए हैं लेकिन यहां औद्योगिक विकास का सपना अगर राजनेता नहीं देखते तो जनता भी नहीं देखती। रोजगार का सवाल अगर राजनेताओं के लिए अहम नहीं है तो जनता के लिए भी अहम नहीं है। यही स्थिति शिक्षा और चिकित्सा की है। देहात में खेती-किसानी या बागवानी और उससे जुड़ी मजदूरी पर लोगों का फोकस है तो नगर में दस्तकारी या मजदूरी पर। अपनी रोजी-रोटी का जुगाड़ लोग खुद कर लेते हैं। चिकित्सा की यूं है कि आयुष्मान कार्ड उनके लिए बड़ा सहारा साबित हो रहा है। बस उनकी समस्या या तो बिजली है या फिर पुलिस थाना। अगर बिजली आपूर्ति ठीक रहे, बिजली का ढांचा ठीक रहे, उनके आपसी फसाद उन्हें थाने तक न ले जाएं तो उनके लिए व्यवस्था की कोई बहुत अधिक अहमियत नहीं है। नगर में भी किसी बड़ी परियोजना की स्थापना का, किसी पार्क का, किसी पुल का, किसी फ्लाई ओवर का, किसी ट्रैफिक सिस्टम का यहां सवाल नहीं है। इसी स्थिति में यहां की राजनीति चलती है और केवल पुलिस तथा बिजली विभाग के भरोसे ही चलती है। इन सारी चीजों को भड़ाना ने समझा है और वे इन्हीं पर फोकस किए हुए हैं।
इस मामले में भड़ाना को इस बात का भी लाभ मिल रहा है कि राज्य में भाजपा की सत्ता का यह दसवां साल है। इन दस सालों में राज्य सरकार ने समान नागरिक संहिता भी लागू कर दी है और मजारों-मदरसों को लेकर भी अपनी सोच को उजागर कर दिया है। लोगों की समझ मेँ आ रहा है कि भाजपा से बहुत डरने की जरूरत नहीं है। गोश्त जैसे धंधे पर अगर सरकार वैध रोक लगाती है तो व्यवस्था उसके अवैध संचालन का मौका भी देती है। फिर कारोबारी व्यक्ति अगर मुस्लिम भी है तो भी मसला नहीं। भाजपाई उन्हें अपने मंचों पर जगह नहीं देते लेकिन अपने दफ्तरों पर तो उनकी बात सुनते ही हैं। उन्हें इतना ही काफी लगता है। आयुष्मान कार्ड और मुफ्त राशन की सुविधा मुस्लिमों को भी मिल रही है। कहने का मतलब यह है कि भड़ाना के पास कांग्रेस के वोट में सेंध लगाने के लिए पर्याप्त कारण हैं। वे दरअसल अपने मतदाता को यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि किसी समुदाय के बीच इस बार उनका विरोध न धर्म के आधार पर हो रहा है और न ही दल के आधार पर। वे सबके साथ हैं और सब उनके साथ हैं। लेकिन उन्हें अपने प्रयासों का कितना लाभ मिलेगा यह चुनाव में ही पता लगेगा।

