
फिलहाल अपने दम पर जोत रहे चुनावी भूमि
एम हसीन
रुड़की। वैसे तो उदय पुंडीर का अभी तक का रिकॉर्ड यह है कि उन्होंने “खास” लोगों को भी कुछ दिया ही है, लिया किसी से कुछ खास नहीं। मसलन, मंगलौर विधानसभा क्षेत्र में 2024 के विधानसभा उप चुनाव में जब गुर्जर बहुल गांवों में कांग्रेस प्रत्याशी क़ाज़ी निजामुद्दीन फंसे हुए थे तब उदय पुंडीर ने ही आमखेड़ी के पूर्व प्रधान जसवीर सिंह आदि को आगे करके कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाया था। ध्यान रहे जसवीर सिंह गुर्जर हैं, सरकार भाजपा की है और भाजपा प्रत्याशी करतार सिंह भड़ाना भी गुर्जर ही हैं। इस भ्रातृ भाव को तोड़कर जसवीर सिंह आदि ने उदय पुंडीर की पहल पर ही क़ाज़ी निजामुद्दीन को वोट दिया था।
इसी प्रकार 2024 में ही हरीश रावत के कांग्रेस प्रत्याशी पुत्र वीरेंद्र रावत को भी उदय पुंडीर ने कुछ दिया ही था, खुद हरीश रावत को 2009 के लोकसभा चुनाव में और उनकी पत्नी रेणुका रावत को भी 2014 के लोकसभा चुनाव में कुछ दिया ही था। बदले में वे विधानसभा टिकट के आकांक्षी रहे हैं जो कि अभी तक उन्हें नहीं मिला है। अब 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है और वो एक बार फिर टिकट के आकांक्षी हैं। इस बार क्या होगा, अभी कहना मुहाल है। खासतौर पर इसलिए क्योंकि इस बार तो यहां टिकट पर दावा खुद पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत कर रहे हैं। लेकिन इन सब चीजों से बेपरवाह उदय पुंडीर विधानसभा क्षेत्र में लगातार अलख जगा रहे हैं। वे मतदाताओं के बीच नियमित रूप से जा रहे हैं और मतदाता के सुख-दुख में बराबर शिरकत दर्ज कर रहे हैं।
जैसा कि सब जानते हैं कि उदय पुंडीर ढंढेरा निवासी हैं और पुराने कांग्रेसी हैं। वे फिलहाल मजदूर कांग्रेस के जिलाध्यक्ष हैं और उन्हें हरीश रावत गुट का चेहरा माना जाता है। हरीश रावत सरकार में उन्होंने ही ढंढेरा नगर पंचायत के गठन का शासनादेश जारी कराया था। उन्हें काम करने वाला कांग्रेसी माना जाता है। ढंढेरा में मुख्य सड़क पर सदा भरा रहने वाले पानी की निकासी के लिए भी उन्होंने हरीश रावत सरकार के दौरान ही गंभीर प्रयास किए थे जिनका अंततः परिणाम भी निकला था। वे खानपुर में कांग्रेस के टिकट की उम्मीद लेकर पूरे विधानसभा क्षेत्र के हर गांव में व्यापक जन संपर्क करते रहे हैं। जाहिर है कि इसके चलते मतदाता के साथ उनके संपर्क भी व्यापक बन गए हुए हैं और इसी कारण उनकी व्यस्तता भी खूब बढ़ गई है। मसलन फिलहाल रामलीला मंचन का समय चल रहा है तो उन्हें भी पूरे क्षेत्र की रामलीलाओं में आमंत्रित किया जा रहा है। वे जा भी रहे हैं। जन कल्याण के और भी अनेक कार्य हैं जो वे कर रहे हैं और लोगों के सामान्य सुख-दुख तो हैं ही जिनमें शिरकत एक दैनिक प्रक्रिया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस के बड़े नेताओं में अगर हरीश रावत को यहां टिकट न दिए जाने पर सहमति बनती है तो क्या उदय पुंडीर के नाम पर सहमति बनेगी?


