रुड़की में “अंडर डॉग” के तरफदार अंतिम पत्रकार थे राव शाहनवाज खां

एम हसीन

जैसा कि सभी जानते हैं कि राव शाहनवाज खां लंबे समय से बीमार थे। मेरी जानकारी के मुताबिक उन्होंने एक दशक से अधिक समय तक बीमारी से संघर्ष किया। यह उनकी भीतरी क्षमता और उनके जीवट का ही परिणाम था कि कैंसर जैसी बीमारी से वे करीब एक दशक तक लड़े और कामयाबी से लड़े। मेरी उनसे आखरी मुलाकात करीब दो महीने पहले शताब्दी द्वार पर हुई थी जहां उन्होंने मुझे फोन करके बुलाया था और मेरे लिए ताज्जुब की बात यह थी कि वे अपनी कार खुद ड्राइव करके रुड़की आए थे। जाहिर है कि वापिस भी गए होंगे। यह उनके बुलंद इरादों का अपने-आपमें प्रमाण था। इस बुनियाद पर मैं कह सकता हूं कि राव शाहनवाज खां 6 जनवरी 2026 को भी कैंसर से नहीं हारे। दरअसल वे हारे हैं समय से; जिससे न कोई जीत पाया है और न जीत सकता है। लेकिन मेरे लिए सवाल यह नहीं है कि रुड़की में राव शाहनवाज के जाने के बाद पत्रकारिता का क्या होगा! कारण, मैं जानता हूं कि रुड़की में पत्रकारिता तो बहुत पहले, तभी मर गई थी जब राव शाहनवाज खां बीमार होने के बाद सेमी-रिटायरमेंट जैसी जिंदगी जीने पर मजबूर हुए थे।

जैसे कि सभी पत्रकार लिख रहे हैं कि राव शाहनवाज खां वरिष्ठ पत्रकार थे। इनमें अधिकांश वही लोग हैं जिन्होंने राव शाहनवाज खां को पत्रकारिता करते हुए नहीं देखा, उनका लिखा हुआ नहीं पढ़ा। उन लोगों में से बहुत कम लोग अब बाकी हैं जिन्होंने शाहनवाज खां को पत्रकारिता करते हुए देखा। इनमें भी कोई एकाध ही ऐसा होगा जो उनका प्रशंसक है, उनकी कार्यशैली का कायल है, उनकी लेखनी का तरफदार है। कारण राव शाहनवाज खां का “वरिष्ठ” पत्रकार होना नहीं है बल्कि “पत्रकार” होना है, पत्रकारिता कर्म के प्रति “निष्ठावान” होना है और अपने पेशे की “पवित्रता का ज्ञान” होना है।

जिन लोगों ने राव शाहनवाज खां को पत्रकारिता करते हुए देखा है वे जानते हैं कि उनके भीतर ये सारी विशेषताएं थीं। वे अपने काम के प्रति इतना समर्पित थे कि जहां उन्हें समय मिलता था वहीं वे खबर लिखने बैठ जाते थे और उन्हें समय तब मिलता था जब वे अपने हाथ में मौजूद काम, जिसे टास्क कहा जा सकता है, से संबंधित सारे तथ्य जुटा चुके होते थे, उसकी पूरी जानकारी हासिल कर चुके होते थे। तब वे कागज़-कलम के हवाले होते थे। दूसरी बात, उनका लिखा हुआ जनहित को समर्पित होता था। यह उनकी कोशिशों का ही फल था कि कलियर जैसा तीर्थ स्थल पत्रकारिता की प्राथमिकता पर आया और रुड़की के मदरसा रहमानिया का प्रबंध किसी हद तक पारदर्शी हुआ। राव शाहनवाज खां की खोजी पत्रकारिता के चलते कितने बेगुनाह लोगों को कानून से राहत मिली या कितने गुनहगारों को सज़ा मिली यह सब रिकॉर्ड की बातें हैं।

ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने मेरे सामने राव शाहनवाज की लंबी बीमारी को उनकी सजा बताया था और ऐसे कितने ही लोग जिन्होंने उनके जीवन संघर्ष को लोगों की दुआओं का हासिल बताया था। जाहिर है कि यह सब नजरिए का सवाल है। बात केवल इतनी है कि अब किसी पत्रकार की लेखनी किसी बेगुनाह को राहत नहीं दिला पाती। यह सब उसी समय खत्म हो गया था जब राव शाहनवाज खां बीमार होकर अपने-आपमें सिमटे थे। वे रुड़की में खोजी पत्रकारिता के जनक थे यह एक सच है और वे हर हाल में “अंडर डॉग” के तरफदार थे, दूसरा सच है। लेकिन अब……।