यूं 2027 का रास्ता आसान कर लेंगे वीरेंद्र जाती?

एम हसीन

रुड़की। जनता ऊर्जा निगम के अधिकारियों से खुश नहीं है। यही कारण है कि जब विधायक वीरेंद्र जाती ने बिजली अधिकारियों के कनेक्शन काटे तो एकाएक उनका राजनीतिक ग्राफ बढ़ गया। यह कुछ ऐसा ही था जैसे सिनेमा के पर्दे पर हीरो के हाथों किसी को पिटते हुए देखकर हाल में बैठे लोग तालियां बजाते हैं। फिर जब बिजली अधिकारियों ने विधायक के विरुद्ध तहरीर दे दी तो उनकी लोकप्रियता और बढ़ गई। इसके बाद विधायक का यह कहना राजनीतिक आडंबर ही है कि वे जनता के लिए सौ मुकद्दमे फेस करने को तैयार हैं। इस प्रकरण के चलते जो राजनीतिक ग्राफ वीरेंद्र जाती का बढ़ा है वह 2027 तक कायम रहेगा या नहीं, यह देखने वाली बात होगी। लेकिन इस विवाद से पहले तक की हकीकत यह रही है कि वीरेंद्र जाती जिले के उन विधायकों में से एक हैं जिनका क्षेत्र में सबसे ज्यादा विरोध देखने में आता रहा है।

अपने क्षेत्र को लेकर वीरेंद्र जाती कितना संवेदनशील हैं इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके क्षेत्र में आने वाली एकमात्र चीनी मिल का पेराई सत्र इस बार अभी तक शुरू नहीं हो पाया है। दूसरी बात बकाया भुगतान की है। मिल की ओर किसानों का सैकड़ों करोड़ बकाया है जिसका भुगतान होने की कोई सूरत नहीं है। इसे लेकर वीरेंद्र जाती की उदासीनता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2022 में उनका चुनाव किसान आंदोलन की सरगर्मियों के दौरान हुआ था और उन्हें उस किसान बेल्ट में प्रभावी समर्थन मिला था जहां कांग्रेस की स्थिति हमेशा कमजोर रहती आई है।

वीरेंद्र जाती को इसीलिए समर्थन मिला था क्योंकि किसानों को उनसे कुछ उम्मीदें थीं। दूसरी बात वीरेंद्र जाती को मुसलमानों का एकमुश्त समर्थन मिला था और आज की हकीकत यह है कि वे मुसलमानों को भी खुश नहीं रख पाए। मिसाल उन सड़कों की दी जा सकती है जो मुस्लिम क्षेत्रों से होकर गुजरती हैं और जिनपर अभी तक भी कोई काम नहीं हुआ है। मिसाल रुड़की-इकबालपुर मार्ग की या रुड़की-नन्हेड़ा वाया माधोपुर मार्ग की दी जा सकती है। अन्य मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भी सामान्य विकास कार्यों की स्थिति ऐसी ही है। यह स्थिति तब है जब यह माना जाता है कि वीरेंद्र जाती सत्ता की राजनीति कर रहे हैं। यह सोच गलत भी नहीं है। मसलन, वे दो साल तक कांग्रेस के जिलाध्यक्ष रहे और उन्होंने एक बयान तक कभी राज्य सत्ता के खिलाफ नहीं दिया, एक धरना प्रदर्शन तक कभी सरकार के खिलाफ नहीं किया।

एक ओर यह स्थिति है। दूसरी उन्हें लेकर चलने वाली यह चर्चा है कि चुनाव से पूर्व वे भाजपा का दामन थाम सकते हैं। जितनी अनदेखी वे क्षेत्र के मुस्लिम क्षेत्रों की कर रहे हैं उसके आलोक में यह चर्चा गलत भी नहीं लगती। और सौ बातों की एक बात उनकी वह कमाई है जो राजनीतिक क्षेत्रों में चर्चा का विषय है। उन्हीं की पार्टी के एक पदाधिकारी उनका उल्लेख आते ही उनकी चार सालों की कमाई गिनाने लगते हैं। पहले उनके वेतन-भत्ते गिनाते हैं, फिर विधायक निधि का कमीशन गिनाते हैं, फिर जिला योजना और राज्य योजना से लेकर आपदा मद, एस सी पी मद का कमीशन और फिर अंत में ट्रांसफर-पोस्टिंग मद में उनकी कमाई गिनवाते हैं। अहम यह है कि चुनाव में मुख्य भूमिका वे ही निभाते हैं जिनकी निगाह जाती की चार सालों की कमाई पर है। सवाल यह है कि “सौ मुकदमों” का जो आडंबर जाती कर रहे हैं, वह 2027 तक उनका साथ दे पाएगा?