क़ाज़ी निज़ामुद्दीन के कैंप में चौधरी जुल्फिकार अख्तर अंसारी का स्थान!

एम हसीन

रुड़की। बसपा को छोड़कर कांग्रेस में पहुंचे चौधरी जुल्फिकार अख्तर अंसारी चूंकि मंगलौर की राजनीति करते हैं इसीलिए स्वाभाविक है कि उन्होंने स्थानीय विधायक क़ाज़ी निज़ामुद्दीन का कैंप ज्वाइन किया है। बेशक इस कैंप में उनकी एंट्री को अभी साल भी पूरा नहीं हुआ है। लेकिन चूंकि पार्टी में नव सृजन अभियान चल रहा है, नया जिला संगठन वजूद में आने की राह पर है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या नए संगठन में चौधरी जुल्फिकार अख्तर अंसारी का कोई स्थान होगा या उन्हें अभी इंतजार करना होगा?

जहां तक जुल्फिकार अख्तर अंसारी की राजनीति का सवाल है, वे मंगलौर नगर पालिका अध्यक्ष पद का चुनाव 2018 में भी लड़ चुके हैं और 2025 में भी। लेकिन दोनों ही बार इस पद का चुनाव यहां बेहद दिलचस्प स्थितियों में हुआ था। 2025 में कांग्रेस पार्टी के घोषित प्रत्याशी चौधरी इस्लाम का पर्चा खारिज हो जाने के बाद जिस प्रकार की राजनीति वहां हुई थी, जिस शिद्दत के साथ निर्दलीय प्रत्याशी लेकर कांग्रेस और भाजपा ने चुनाव लड़ा था, जितनी ताकत दोनों पार्टियों ने चुनाव में झोंकी थी, उसे मद्देनजर रखते हुए किसी तीसरे प्रत्याशी के लिए यहां कोई गुंजाइश बच ही नहीं पाई थी। इसी प्रकार 2018 के चुनाव में, जब हाजी सरवत करीम अंसारी हयात थे तब भी राजनीति कमोबेश ऐसी ही हुई थी। तब कांग्रेस ने चौधरी इस्लाम को और हाजी सरवत करीम अंसारी ने डॉ शमशाद को निर्दलीय लड़ाया था और पूरे मान-सम्मान का प्रश्न बनाकर लड़ाया था। तब डॉ शमशाद विजयी हुए थे। तब भी चौधरी जुल्फिकार अख्तर अंसारी के लिए कोई रास्ता नहीं बन पाया था।

बहरहाल, उन्होंने 2025 में निकाय परिणाम आने के बाद क़ाज़ी कैंप ज्वाइन कर लिया था और तब से वे ही क़ाज़ी के प्रति वफादारी निभाते आ रहे हैं। जहां तक जुल्फिकार की पारिवारिक पृष्ठभूमि और महत्वकांक्षा का सवाल है, उनके पिता चौधरी अख्तर अंसारी उस समय नगर पालिका के तीन बार अध्यक्ष रह चुके हैं जब मंगलौर की राजनीति की कमान क़ाज़ी निज़ामुद्दीन के पिता क़ाज़ी मुहीउद्दीन के हाथ में होती थी। इतना ही नहीं। एक बार जुल्फिकार की माता भी नगर पालिका अध्यक्ष निर्वाचित हुई थी। अपनी इस स्वर्णिम राजनीतिक पृष्ठभूमि को चौधरी जुल्फिकार अख्तर अंसारी सेवा और अभिमान के रूप में याद करते हैं। उनका कहना है कि उनके पिता ने लोगों की सेवा की और सम्मान पाया। उनका यह भी मानना है कि क़ाज़ी और उनके परिवार की एकता की केमिस्ट्री हमेशा मंगलौर के हित में साबित हुई है। इसी परंपरा को वे कायम करना चाहते हैं। जहां तक क़ाज़ी निज़ामुद्दीन के प्रति उनकी वफादारी का सवाल है, कुछ महीने पहले मुख्यमंत्री के “हाजी बनाम क़ाज़ी” बयान पर जब क़ाज़ी निज़ामुद्दीन और उबैदुर्रहमान अंसारी उर्फ मोंटी के बीच जुबानी विवाद हुआ था तब चौधरी जुल्फिकार अख्तर अंसारी क़ाज़ी के अकेले ऐसे वफादार साबित हुए थे जिन्होंने क़ाज़ी की ओर से मोर्चा थामा था और मोंटी को करारा जवाब दिया था। क़ाज़ी का और कोई वफादार तब सामने नहीं आया था। ऐसे में कोई बड़ी बात नहीं कि क़ाज़ी कैंप में जुल्फिकार का महत्व कायम हुआ हो और उनके प्रति क़ाज़ी के मन में कोई भावना पैदा हुई हो। निकट भविष्य में जब पार्टी जिलाध्यक्ष हाजी फुरकान अहमद अपनी कार्यकारिणी का गठन करेंगे तब चौधरी जुल्फिकार अख्तर अंसारी को मिलने वाला पद उनकी क़ाज़ी के प्रति वफादारी को साबित करेगा। या फिर यह कि 2030 के निकाय चुनाव में क़ाज़ी उन्हें अपना नगर पालिका अध्यक्ष पद का प्रत्याशी बनाते हैं या नहीं।