क्या 2027 में “मूंछ” की लड़ाई लड़ने वाले हैं खानपुर विधायक?

एम हसीन

रुड़की। खानपुर विधायक उमेश कुमार का पहला विधायक कार्यकाल परिपक्व हो चुका है और अब समापन की ओर बढ़ रहा है। कार्यकाल का चौथा साल पूरा होने जा रहा है और इसके साथ ही अगले कार्यकाल की उनकी तैयारियां भी चरम की ओर पहुंचने वाली हैं। लेकिन मौजूदा कार्यकाल में ही उमेश कुमार में एक बदलाव नजर आ रहा है। कार्यकाल का चौथा साल पूरा होते-होते उन्होंने अपने चेहरे पर मूंछें न केवल उगा ली हैं बल्कि वे उसे मुतवातर खाद-पानी भी दे रहे हैं। उनकी मूंछों की कोरो ने नुकीला रूप अख्तियार करना शुरू कर दिया है। साफ लग रहा है कि वे उन्हें और अधिक कटारदार बनाने के प्रयास में हैं। इस बिंदु पर यह उल्लेखनीय है कि उमेश कुमार के सामने जो पूर्व विधायक प्रणव सिंह चैंपियन बिना मुकाबले में आए ही कायम रहे थे उनकी मूंछें कटारदार हैं और अपनी मूंछों पर चैंपियन का अभिमान उनके जताए बगैर भी नजर आता है। यह तो भविष्य की बात है कि इस बार भी उमेश कुमार का चैंपियन के साथ सीधा मुकाबला होगा या नहीं। लेकिन यह लगता है कि उमेश कुमार अपना अगला मुकाबला चैंपियन से ही तय मानकर चल रहे हैं। इसी कारण उन्होंने भी मूंछें उगाई हैं। या फिर वे इस हकीकत को समझ गए हैं कि खानपुर के चुनावी संघर्ष में भी मूंछों का भारी महत्व है।

उमेश कुमार उस शहरी संस्कृति से आते हैं जहां मूंछों का बहुत अधिक महत्व नहीं होता। लोग चेहरे को साफ रखते हैं। केवल दाढ़ी और मूंछ को ही नहीं बल्कि चेहरे के अन्य हिस्सों में उग आने वाले बालों को साफ करने के लिए वैक्सिंग तक कराते हैं। वहां मान-सम्मान की लड़ाई भी पर्दे के पीछे से ही लड़ी जाती है। इस संस्कृति के पोषकों ने चैंपियन के खिलाफ पर्दे के पीछे से ही राजनीतिक लड़ाई लड़ी थी। यह लड़ाई दो स्तरों पर हुई थी। एक, भाजपा के भीतर चैंपियन के टिकट पर घात लगाई गई थी। चूंकि चैंपियन मूंछों पर अभिमान रखते हैं और खुलकर लड़ते हैं, इसलिए उन्हें उकसाया गया था। वे उकसाए में आए थे और इतना कुछ बोल गए थे कि टिकट गंवा बैठे थे। पार्टी ने तब उनके पूर्व राजा होने और उनके चार बार विधायक रहा होने का इतना मान रखा था कि उनकी पत्नी को टिकट दे दिया था। यूं चैंपियन विरोधी लॉबी एक लड़ाई जीत गई थी। लड़ाई का दूसरा स्तर यह था कि कांग्रेस का टिकट सुभाष चौधरी को देकर दांव उमेश कुमार पर लगाया गया था। यूं क्षेत्र में कांग्रेस का फातिहा पढ़कर उमेश कुमार को विधानसभा का सदस्य बनाया गया था।

2022 में उमेश कुमार की जीत निश्चित रूप से उनकी अपनी नहीं थी। इतिहास गवाह है कि उन्हें एक टास्क दी गई थी और एक स्क्रीन पले दिया गया था। उस पर उन्होंने काम किया था। तब उन्होंने अपने-आपको हर मामले में चैंपियन से सवाया साबित किया था। चैंपियन केवल जमीन पर जलवे बिखेरते थे, उन्होंने आसमान में भी जलवे बिखेरे थे। उन्होंने फिल्म और क्रिकेट स्टार तक क्षेत्र में उतारे थे। इसके बावजूद वे यह सच्चाई नहीं छुपा पाए थे कि असल में वे जीते नहीं थे बल्कि वे चैंपियन हारे थे जो चुनाव लड़ भी नहीं रहे थे। जब वे इस हकीकत को जानते हैं तो यह भी जानते हैं कि 2027 में अगर उन्हें खुद को कायम रखना है तो उन्हें अपने उस जलवे को ड्योढ़ा बल्कि दोगुना साबित करना होगा जो उन्होंने 2022 में स्थापित किया था। वे चैंपियन विरोधियों के कितने भी चहेते हों लेकिन खानपुर में अभी ऐसे हालत वे नहीं बना पाए हैं कि चैंपियन को उनके गोल में आकर लड़ना पड़े। लड़ना अभी भी उन्हें चैंपियन के गोल में ही जाकर पड़ेगा; खासतौर पर इसीलिए कि अब चैंपियन नई ऊर्जा से लैस हैं। संक्षेप यह है कि उमेश कुमार 2027 में भी सेफ जोन में नहीं होंगे। इसी सबके बीच क्षेत्र में बतौर विधायक कार्य करते हुए उमेश कुमार ने शायद इस बात को बेहतर ढंग से समझ लिया है कि इस निपट देहाती क्षेत्र में राजनीति करने के लिए न केवल मूंछों का होना जरूरी है बल्कि लड़ाई को “मूंछों की लड़ाई” के रूप में लड़ना भी जरूरी है। इसी कारण वे अपनी मूंछों को प्रभावशाली बनाने को प्रयासरत हैं।